हररोज नयी उम्मीद के साथ कुछ नये सपने बुनती हूँ
आजकल मैं खुद को चुनती हूँ...
मुठ्ठी से रेत की तरह घड़िया निकल जाती हैं...
जिम्मीदारियोके बीच अनगिनत ख्वाहिशे छूप जाती हैं…
उन अधूरी ख्वाहिशों को अपनी ताकद बनाये चलती हूँ…
आजकल मैं खुद को चुनती हूँ...
इस कदर मसरूफ रहते हैं की काम खत्म ही नहीं होता…
दिल कहता हैं ठहर जा थोड़ा और दिमाग रुकने नही देता...
पर दिल और दिमाग मे अब मैं दिल की ज्यादा सुनती हूँ
आजकल मैं खुद को चुनती हूँ...
अच्छा लगता हैं यू दिल की सुनना…
अपने अरमानों को नए सिरे से मिलना…
क्या हैं वो जो आँसू दे जाए…
क्या हैं वो जो सुकून ले आए…
जाहिर करूँ ये सब तो एक अलग खुशी मिलती हैं…
अपने जज्बातोंको मैं अब अल्फाजों में लिखती हूँ
आजकल मैं खुद को चुनती हूँ...
कितनी दूर जा पाऊंगी पता नही…
दिल की बात लिखती हूँ और कोई मेरी खता नही…
मुझे 'खुद' से मिलाने वाली ये राह हैं...
बस खुद को खुद से बेहतर बनाने की चाह हैं…
अब नयी उम्मीद के साथ कुछ नये सपने बुनती हूँ
आजकल मैं खुद को चुनती हूँ...
-शुभदा
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